रविवार, 3 नवंबर 2019

भाषा क्या है?



भाषा भावों का संप्रेषण?
भाषा अनुभव का निर्देशन?
भाषा मात्र अर्थ उत्प्रेरण?
या कि सूचनाओं का नियमन?
कुछ ध्वनियों का, वर्णों का सञ्जाल?
अर्थपूर्ण चिन्हों का मायाजाल?
भाषा है व्याकरण या कि उच्चारण?
याकि और कुछ-- लेखन, वाचन, भाषण?
भाषा क्या है?
भाषा है भाषक का परिचय?
चिंतक के चिंतन का निश्चय?
भाषा क्या इतनी है समर्थ,
कह दे मन के जो सभी अर्थ?
----फिर शव्द मूक होजाते क्यों,
जब मौन बोलने लगता है?
चेहरा बनजाता सहज ग्रन्थ,
सब अर्थ खोलने लगता है?
भाषा क्या है?
क्या चैराहे के भिक्षुक की रिरियाहट भी इक भाषा है?
मिडई महतो की बैलों पर झल्लाहट भी क्या भाषा है?
क्या भाषा होती अर्थहीन, वक्ता से होती अर्थवती?
सत्ता की खांसी अर्थयुक्त, निर्वल की विनती क्या कहती?
क्या कुटिल गुरु के पास यही भाषा बन जाती शव्द जाल?
क्या राजनीति में बने यही भाषा नफरत की असि कराल?
क्या भाषा ही डंडी बनकर नरभीड़ नहीं ठेला करती?
क्या भाषा ही छलिया बनकर मासूमो को छला करती?
भाषा क्या है?





प्रेमपंथ की सारी यात्रा कंटकपथ पर ही क्यों बीते



प्रेमपंथ की सारी यात्रा कंटकपथ पर ही क्यों बीते?
चलो घड़ीभर बैठें चलकर उस उपवन में तरुके नीचे...
जहाँ लताएं नव तरुओं का आलिंगन झुक कर करतीं हों
पुष्पों के कानो में कोयल, अद्भुत प्रेम कथा कहती हो...
पुष्प वल्लरी कुछ अलसाकर, तिरछे नयनो से कुछ कहकर
प्रियतम को कुछ समझाती हो, नत मृदु-स्मित शर्माती हो...
जहॉँ पुष्प का प्रणय-निवेदन, नटखट भौरा लेकर सत्वर
नवल जूही से कह आता हो, गूढ़ संदेसा पहुंचता हो .....

द्विज राम कहाने वाला है




जब शास्त्र स्वयं असुरक्षित हों
वेदों के पाठ अरक्षित हों
जब भुजबल मद में सहसबाहु
गुरुकुल आक्रांता लक्षित हों
गुरु-विप्रों के गोधन जिस दिन
राजाओं को खटकने लगें
विद्या विद्यालय असुरक्षित
शासक पथ से भटकने लगें
तब समझो कोई शास्त्रऋषि
अब शस्त्र उठाने वाला है
हांथों में ले फरसा कराल
द्विज राम कहाने वाला है

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

करोड़ी की चिट्ठी आयी



इस रास्ते से सीधे जाना
दायाँ मोड़ पड़े मुड़ जाना

दोनों तरफ दुमहले होंगे
कुत्तों वाले बंगले होंगे
उससे भी तुम आगे जाना
पार्क मिले वहां रुक जाना

थोड़ा सा दाएं मुड जाना
बांये तरफ पड़ेगा थाना...

ठीक सामने पीली कोठी
जिसमे रहता नेता पोथी
हर महीने टेलर बुलवाता
कुरते को ढीला करवाता


उसी गली से सीधे जाना
कचरा ढेर मिले रुक जाना
वहीँ कहीं पर भग्गू, धीरा
दल्लु, मंगत, पिल्लू, हीरा
कचरा टाट बीनते होंगे
रोटी एक ढूंढते होंगे

वहां खड़े होकर चिल्लाना
“मुझे करोड़ी के घर जाना”
कोई तुम्हे बता ही देगा
खोली तुम्हे दिखा ही देगा


गंदे नाले की पटरी पर
तनी मिलेगी फटी चटाई
उसके बेटे दल्लू ने जो
पिछले साल ढेर में पाई
उसमे रहता श्रमिक करोड़ी
नहीं बनाए बनती कौड़ी

ऊँची कोठी के कुत्ते भी
सुबह – सुबह जब सोए रहते
सुख सपनो में खोए रहते
जाग चुका है श्रमिक करोड़ी
टायर जला पका ली थोड़ी
मोटे चावल वाली खिचड़ी

उसके बच्चे मंगत चुन्नी
और पड़ोसी की भी मुन्नी
चले गए हैं कचरा लेने
अपने हिस्से का हक़ लेने


और करोड़ी बाँध पोटली
लेकर एक फावड़ा तसली
जाकर बैठ गया चौराहे
शायद आज मजूरी पाए


तीन दिनों से खाली जाता
सबको कहाँ काम मिल पाता
घर का हुआ कनस्टर खाली
फिर बीमार पड़ी घरवाली


चले आ रहे मोटे लाला
खाए पान बनारस वाला
"सौ पर काम करो तो आओ
नहीं आज बैठे रह जाओ"


दिनभर बहा पसीना आया
सौ का एक नोट ले आया
लगा रहा है जोड़ घटाना
कैसे आज  मिलेगा खाना


उसी करोड़ी की यह चिट्ठी
वहीँ डाकियाजी पहुचना
उसको आज मिलेगा खाना
कल क्या होगा किसने जाना

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

एक बूंद की खोज कहाँ तक लेआयी

एक बूंद की खोज कहाँ  तक  लेआयी
बन में  गिरि में क्यों मै फिरती अकुलाई...

अभिलाषा की  प्यास  लिए  उर
आकांक्षा के  पंख  लगाकर
कहाँ  कहाँ  मै  उड़  आई...
एक बूंद की खोज कहाँ  तक  लेआयी...


स्वर्ण निवाले  क्रय  करने  को  भूख  बेंच  दी
नीद  बेंच  दी  और  खरीदी  कोमल  सेजा
मिश्री  खाने  हेतु  आह  क्यों  जिह्वा गिरवी कर आयी ....
एक बूंद की खोज कहाँ  तक  लेआयी...



जिज्ञासु समर्पण, कवि परिचय, प्रस्तावना एवं वंदना

जिज्ञासु    डॉ . बृजमोहन मिश्र   समर्पण   पूज्या माता स्वर्गीया मंगला देवी एवं पूज्य पिता श्री रामू लाल मिश्र को ...